हिन्दू मुस्लिम एकता शायरी - Hindu Muslim Ekta Status in Hindi 2022

हिन्दू मुस्लिम एकता शायरी - हेलो दोस्तों , आज की इस पोस्ट में हम आपके लिए हिन्दू मुस्लिम एकता स्टेटस शायरी लेकर के आये है। क्युकी हर हिन्दू-मुस्लिम भाई-भाई है। सोशल मीडिया के जरिए जिस प्रकार से हिन्दू और मुस्लिम लोगों को भड़काया जाता है उसी प्रकार आप सोशल मीडिया पर हिंदी मुस्लिम एकता पर लिखे इन स्टेटस को लगाकर आप हिन्दू मुस्लिम एकता और भाईचारे की भावना को बढ़ा सकते है। इस लिए हम हिन्दू मुस्लिम स्टेटस शायरी लेकर आये है। आप इन स्टेटस को अपने सोशल मीडिया पर शेयर कर सकते है। सोशल मीडिया का सदुपयोग दो धर्मो के बीच दूरियों को कम कर सकते है। उम्मीद है कि आपको यह पोस्ट पसंद आएगी।

हिन्दू मुस्लिम एकता शायरी

हिन्दू मुस्लिम एकता - Hindu Muslim Ekta Status & Shayari in Hindi

मैं मुस्लिम हूँ, तू हिन्दू है, हैं दोनों इंसान,

ला मैं तेरी गीता पढ़ लूँ, तू पढ ले कुरान,

अपने तो दिल में है दोस्त, बस एक ही अरमान,

एक थाली में खाना खाये सारा हिन्दुस्तान।


जब मोहब्बत लिखी हुई है गीता और क़ुरान में।

फिर ये कैसा झगड़ा हिन्दू और मुसलमान में।

लोग पढ़ लिखकर हिन्दू और मुसलमान हो गए

मैं ठहरा अनपढ़ इन्सान ही रह गया...

फिर ना कोई हिंदू रहता है ना मुसलमान रहता है।

वतन पर मिटने को तैयार सारा हिंदुस्तान रहता है।

किसी को हिन्दू, किसी को मुसलमान, पसन्द हैं,

मैं छोटा आदमी हूँ, मुझको हिन्दुस्तान पसन्द हैं.!! 


संस्कार और संस्कृति की शान मिले ऐसे,

हिन्दू मुस्लिम और हिंदुस्तान मिले ऐसे

हम मिलजुल के रहे ऐसे कि

मंदिर में अल्लाह और मस्जिद में राम बसे जैसे।

 

क्या क़त्ल व ग़ारत ख़ूंरेज़ी,

तारीफ़ यही ईमान की है।

क्या आपस में लड़कर मरना,

तालीम यही कुरआन की है!

 

इंसाफ़ करो, तफ़सीर यही

क्या वेदों के फ़रमन की है।

क्या सचमुच यह ख़ूंख़ारी है,

आला ख़सलत इंसान की है?

 

‘मालिक मेरे नमाज की चादर सँवार दो,

मदीने अपने बुला लो हमें गरीब नवाज,

बहुत उठाए अलम, रंजो सहे, गम भी सहे,

अपनी कमाली में छुपा लो हमें गरीब नवाज

 

बड़े अनमोल हे ये खून के रिश्ते

इनको तू बेकार न कर,

मेरा हिस्सा भी तू ले ले मेरे भाई

घर के आँगन में दीवार ना कर।

 

याद तेरी द‍ीदार बरस में पाऊँ।

छूटे नहीं लागी तेरी, प्रीतिमा को पाऊँ।

रोजा सजाऊँ, पाऊँ रमजान महीना।’

 

कुछ जाते है मंदिरो में, कुछ मस्जिदों की राह अपनाते है

पर मक़सद तो सबका एक ही, जिसे लोग ख़ुशी की फ़रियाद कहते है

वो एक ही हस्ती, एक ही वजूद है. जिसने ये सारा जहान बनाया है

फर्क इतना की कुछ उसे “खुदा” तो कुछ उसे “भगवान्” कहते है

 

हाकिमे वक्त ने ये कैसा हिन्दुस्तान कर दिया....!!

बेजान इमारत को हिन्दु मुस्लमान कर दिया.....

ना हिन्दू खड़ा है ना मुस्लमान खड़ा है

आसिफा के साथ पूरा हिंदुस्तान खड़ा है

में हिन्दू तू मुसलमान, छोड़ ये खींचतान...

में केसरिया लाऊं तू हरा ला,

बनाएं एक प्यारा हिंदुस्तान..


पाक मुहब्बत थी बचपन में हर इक ज़ात से ,

बड़े हो कर बट गये हैं हिन्दू मुस्लिम की बात से

बचपन में जिन गलियों में मिलकर, खेलते थे हम गिल्ली-डंडा!

सुना हैं कि आजकल वहाँ, हिन्दू-मुसलमान बसते है!

हम अपनी जान के दुश्मन को अपनी जान कहते हैं

मोहब्बत की इसी मिट्टी को हिंदुस्तान कहते हैं

 

संस्कार और संस्कृति की शान मिले ऐसे,

हिन्दू मुस्लिम और हिंदुस्तान मिले ऐसे,

हम मिलजुल के रहे ऐसे कि

मंदिर में अल्लाह और मस्जिद में राम बसे जैसे।

 

आप अपने धर्म अपने मजहब के लिए मन में आस्था रखिए,

मगर किसी और के मजहब या धर्म के लिए द्वेष मत रखिए।

 

हिन्दू मुस्लिम बाद में कर लेना जालिमों,

अपने अपने धर्म के टुकड़ों को तो एक कर लो।

 

अकेले में अक्सर हम अपनी परछाइयों से डर जाते हैं,

साथ मिले गर किसी का तो हम दुनिया जीत जाते हैं।

 

पहले जमीं बँटी फिर घर भी बँट गया,

इंसान अपने आप में कितना सिमट गया।

 

जमीनें बाँटते फिरते हो, आसमान बाटों तो माने,

अलग किये इंसान बड़े, परिंदे छाटों तो माने,

जब पैदा हुआ था आदम तो क्या था

हिन्दू या मुसलमान, मजहब बताओ तो माने।

प्रेम जोड़ती है इसलिए प्रेम से ताकत बढ़ती हैं,

नफ़रत तोड़ती है इसलिए नफ़रत से ताकत घटती है।

 

भगवान भी हर जगह है और अल्लाह भी हर जगह है, तो क्या ऐसा नहीं हो सकता कि भगवान मस्ज़िद में भी हों, और अल्लाह मंदिर में भी

 

एक हो जाएँ तो बन सकते हैं ख़ुर्शीद-ए-मुबीं,

वर्ना इन बिखरे हुए तारों से क्या काम बने।

 

तुम राम कहो, वो रहीम कहें,

दोनों की ग़रज़ अल्लाह से है।

तुम दीन कहो, वो धर्म कहें,

मंशा तो उसी की राह से है।

तुम इश्क कहो, वो प्रेम कहें,

मतलब तो उसकी चाह से है।

वह जोगी हो, तुम सालिक हो,

मक़सूद दिले आगाह से है।

 

बड़े अनमोल हे ये खून के रिश्ते

इनको तू बेकार न कर,

मेरा हिस्सा भी तू ले ले मेरे भाई

घर के आँगन में दीवार ना कर।

 

आज मुझे फिर इस बात का गुमान हो,

मस्जिद में भजन मंदिरों में अज़ान हो,

खून का रंग फिर एक जैसा हो,

तुम मनाओ दिवाली मेरे घर रमजान हो।

 

मैं मुस्लिम हूँ, तू हिन्दू है, हैं दोनों इंसान,

ला मैं तेरी गीता पढ़ लूँ, तू पढ ले कुरान,

अपने तो दिल में है दोस्त, बस एक ही अरमान,

एक थाली में खाना खाये सारा हिन्दुस्तान।

 

जाती पाती के नाम पर इंसान ने बेच दिया इस जहान को

कुछ इसे कृपा कहते है, कुछ इसे खुदा का फरमान कहते है

हम तो सोच समझकर भी कुछ समझ नहीं पाते यारो

कुछ ऐसी बाते ये नादान परिंदे, बेजुबान कहते है

 

अजीब मखलूक है यारो जिसे लोग इंसान कहते है

आज फिर हम अपने दिल का एक सच बयान कहते है

न ही फर्क एक तिनके का भी न ही खून का रंग कुछ और है

बस फर्क ये की किसी को लोग हिन्दू, तो किसी को मुसलमान कहते है

 

बड़े अनमोल हे ये खून के रिश्ते

इनको तू बेकार न कर,

मेरा हिस्सा भी तू ले ले मेरे भाई

घर के आँगन में दीवार ना कर।

 

आज मुझे फिर इस बात का गुमान हो,

मस्जिद में भजन मंदिरों में अज़ान हो,

खून का रंग फिर एक जैसा हो,

तुम मनाओ दिवाली मेरे घर रमजान हो।

दोस्ताना इतना बरकरार रखो कि,

मजहब बीच में न आये कभी,

तुम उसे मंदिर तक छोड़ दो ,

वो तुम्हें मस्जिद छोड़ आये कभी।

 

मैं मुस्लिम हूँ, तू हिन्दू है, हैं दोनों इंसान,

ला मैं तेरी गीता पढ़ लूँ, तू पढ ले कुरान,

अपने तो दिल में है दोस्त, बस एक ही अरमान,

एक थाली में खाना खाये सारा हिन्दुस्तान।

 

आँख वालों को हिन्दु या मुसलमान दिखता है.

मैं अंधा हूँ मुझे हर शख्स में इंसान दिखता है !

 

अजीब मखलूक है यारो जिसे लोग इंसान कहते है

आज फिर हम अपने दिल का एक सच बयान कहते है

न ही फर्क एक तिनके का भी न ही खून का रंग कुछ और है

बस फर्क ये की किसी को लोग हिन्दू, तो किसी को मुसलमान कहते है

Hindu Muslim Bhai Bhai Quotes

तुम ऐसे बुरे आमाल पर,

कुछ भी तो ख़ुदा से शर्म करो।

पत्थर जो बना रक्खा है ‘शहीद’,

इस दिल को ज़रा तो नर्म करो।

 

आज मुझे फिर इस बात का गुमान हो,

मस्जिद में भजन मंदिरों में अज़ान हो,

खून का रंग फिर एक जैसा हो,

तुम मनाओ दिवाली मेरे घर रमजान हो।

 

दोस्ताना इतना बरकरार रखो कि,

मजहब बीच में न आये कभी,

तुम उसे मंदिर तक छोड़ दो ,

वो तुम्हें मस्जिद छोड़ आये कभी।

 

क्यों लड़ता है, मूरख बंदे,

यह तेरी ख़ामख़याली है।

है पेड़ की जड़ तो एक वही,

हर मज़हब एक-एक डाली है।

 

बनवाओ शिवाला, या मस्जिद,

है ईंट वही, चूना है वही।

मेमार वही, मज़दूर वही,

मिट्टी है वही, चूना है वही।

 

अजीब मखलूक है यारो जिसे लोग इंसान कहते है

आज फिर हम अपने दिल का एक सच बयान कहते है

न ही फर्क एक तिनके का भी न ही खून का रंग कुछ और है

बस फर्क ये की किसी को लोग हिन्दू, तो किसी को मुसलमान कहते है

 

कुछ जाते है मंदिरो में, कुछ मस्जिदों की राह अपनाते है

पर मक़सद तो सबका एक ही, जिसे लोग ख़ुशी की फ़रियाद कहते है

वो एक ही हस्ती, एक ही वजूद है. जिसने ये सारा जहान बनाया है

फर्क इतना की कुछ उसे “खुदा” तो कुछ उसे “भगवान्” कहते है

 

तुम ऐसे बुरे आमाल पर,

कुछ भी तो ख़ुदा से शर्म करो।

पत्थर जो बना रक्खा है ‘शहीद’,

इस दिल को ज़रा तो नर्म करो।

 

‘मालिक मेरे नमाज की चादर सँवार दो,

मदीने अपने बुला लो हमें गरीब नवाज,

बहुत उठाए अलम, रंजो सहे, गम भी सहे,

अपनी कमाली में छुपा लो हमें गरीब नवाज

 

बड़े अनमोल हे ये खून के रिश्ते

इनको तू बेकार न कर,

मेरा हिस्सा भी तू ले ले मेरे भाई

घर के आँगन में दीवार ना कर।

 

याद तेरी द‍ीदार बरस में पाऊँ।

छूटे नहीं लागी तेरी, प्रीतिमा को पाऊँ।

रोजा सजाऊँ, पाऊँ रमजान महीना।’

 

एक ही है सबकी मंजिल बस लफ़्ज़ों के तराने बदल जाते है दोस्तों

वो एक ही मुकाम है, जिसे कुछ स्वर्ग तो कुछ जन्नत का दरबार कहते है

कुछ जाते है मंदिरो में, कुछ मस्जिदों की राह अपनाते है

पर मक़सद तो सबका एक ही, जिसे लोग ख़ुशी की फ़रियाद कहते है

 

तकबीर का जो कुछ मतलब है,

नाकस की भी मंशा है वही।

तुम जिनको नमाजे़ कहते हो,

हिंदू के लिए पूजा है वही।

 

फिर लड़ने से क्या हासिल है?

ज़ईफ़ हम, हो तुम नादान नहीं।

भाई पर दौड़े गुर्रा कर,

वो हो सकते इंसान नहीं।

 

तुम राम कहो, वो रहीम कहें,

दोनों की ग़रज़ अल्लाह से है।

तुम दीन कहो, वो धर्म कहें,

मंशा तो उसी की राह से है।

तुम इश्क कहो, वो प्रेम कहें,

मतलब तो उसकी चाह से है।

वह जोगी हो, तुम सालिक हो,

मक़सूद दिले आगाह से है।

 

तुम इश्क कहो, वो प्रेम कहें,

मतलब तो उसकी चाह से है।

वह जोगी हो, तुम सालिक हो,

मक़सूद दिले आगाह से है।

 

क्यों लड़ता है, मूरख बंदे,

यह तेरी ख़ामख़याली है।

है पेड़ की जड़ तो एक वही,

हर मज़हब एक-एक डाली है।

 

बनवाओ शिवाला, या मस्जिद,

है ईंट वही, चूना है वही।

मेमार वही, मज़दूर वही,

मिट्टी है वही, चूना है वही।

 

जाती पाती के नाम पर इंसान ने बेच दिया इस जहान को

कुछ इसे कृपा कहते है, कुछ इसे खुदा का फरमान कहते है

हम तो सोच समझकर भी कुछ समझ नहीं पाते यारो

कुछ ऐसी बाते ये नादान परिंदे, बेजुबान कहते है

 

आज मुझे फिर इस बात का गुमान हो,

मस्जिद में भजन मंदिरों में अज़ान हो,

खून का रंग फिर एक जैसा हो,

तुम मनाओ दिवाली मेरे घर रमजान हो।

 

कोई पूजे पत्थर को, कोई सजदे में अपना सर झुकाते है

ये एक ही है बस कुछ इसे पूजा, तो कुछ इसे अपना ईमान कहते है

एक ही रिवाज़, एक ही रसम, बस कुछ अंदाज़ बदल जाते है

वरना एक ही है जिसे कुछ उपवास, तो कुछ रमज़ान कहते है

 

तुम राम कहो, वो रहीम कहें,

दोनों की ग़रज़ अल्लाह से है।

तुम दीन कहो, वो धर्म कहें,

मंशा तो उसी की राह से है।

 

दोस्ताना इतना बरकरार रखो कि,

मजहब बीच में न आये कभी,

तुम उसे मंदिर तक छोड़ दो ,

वो तुम्हें मस्जिद छोड़ आये कभी।

 

तकबीर का जो कुछ मतलब है,

नाकस की भी मंशा है वही।

तुम जिनको नमाजे़ कहते हो,

हिंदू के लिए पूजा है वही।

 

फिर लड़ने से क्या हासिल है?

ज़ईफ़ हम, हो तुम नादान नहीं।

भाई पर दौड़े गुर्रा कर,

वो हो सकते इंसान नहीं।

 

कोई पूजे पत्थर को, कोई सजदे में अपना सर झुकाते है

ये एक ही है बस कुछ इसे पूजा, तो कुछ इसे अपना ईमान कहते है

एक ही रिवाज़, एक ही रसम, बस कुछ अंदाज़ बदल जाते है

वरना एक ही है जिसे कुछ उपवास, तो कुछ रमज़ान कहते है

 

बातें अमन चैन की अब अवाम तक पहुंचने दो।

ये नफ़रत की सियासत हिंदू मुसलमान तक न पहुंचने दो।।

मुझे वजह ना दो हिन्दू या मुसलमान होने की,

मुझे तो सिर्फ तालीम चाहिए एक ”इंसान” होने

की..

 

एक सैनिक ने क्या खूब कहा है...

किसी गजरे की खुशबु को महकता छोड़ आया हूँ,

मेरी नन्ही सी चिड़िया को चहकता छोड़ आया हूँ,

मुझे छाती से अपनी तू लगा लेना ऐ भारत माँ,

मैं अपनी माँ की बाहों को तरसता छोड़ आया हूँ।

जय हिन्द...

 

वो तो बच निकले थे उस धर्म की लड़ाई से

हमे अपनी समझ क़ा इस्तेमाल करना होगा

कॆ धर्म कॆ नाम से लड़ने पर नुकसान किसका है और फायदा किसका।

 

तू हिन्दु बनेगा ना मुसलमान बनेगा,

इन्सान की औलाद है इन्सान बनेगा।

 

सात संदूक़ों में भर कर दफ़्न कर दो नफ़रतें 

आज इंसाँ को मोहब्बत की ज़रूरत है बहुत

 

वो दिलों में आग लगाएगा मैं दिलों की आग बुझाऊंगा।

उसे अपने काम से काम है मुझे अपने काम से काम है।।

 

मज़हब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना

हिन्दी हैं हम वतन है हिन्दोस्ताँ हमारा

 

सभी थे एकता के हक़ में लेकिन।

सभी ने अपनी अपनी शर्त रख दी।।

 

मुझ में थोड़ी सी जगह भी नहीं नफ़रत के लिए,

मैं तो हर वक़्त मोहब्बत से भरा रहता हूँ।

 

कोई पूजे पत्थर को, कोई सजदे में अपना सर झुकाते है

ये एक ही है बस कुछ इसे पूजा, तो कुछ इसे अपना ईमान कहते है

एक ही रिवाज़, एक ही रसम, बस कुछ अंदाज़ बदल जाते है

वरना एक ही है जिसे कुछ उपवास, तो कुछ रमज़ान कहते है

 

जाती पाती के नाम पर इंसान ने बेच दिया इस जहान को

कुछ इसे कृपा कहते है, कुछ इसे खुदा का फरमान कहते है

हम तो सोच समझकर भी कुछ समझ नहीं पाते यारो

कुछ ऐसी बाते ये नादान परिंदे, बेजुबान कहते है

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